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बदलकर, 20 कहातनयां आ जाती हैं । इसमलए मैं कहता हं कक अन्य भाषाओं
ू
का साहहत्य अनूहदत होना चाहहए ।
हमारे यहां साहहत्य के क्षेत्र में कायत करने िालों को बहत अच्छी
ु
नजर से नहीं देखा जाता है । बहत से लोग हैं जो अंग्रेजी में मलखते हैं और
ु
बुकर सम्मान प्राप्त हो जाता है । लेककन हहंदी साहहत्य में नोबेल और बुकर
सम्मान की पहंच नहीं है । मेरा कहना यही है कक दुतनया को सबसे अच्छा
ु
साहहत्य होने के बाद भी हमें सम्मान नहीं ममलता । दुतनया के ककसी भी मुकक
में 40 गांि पार करने के बाद ममट्टी नहीं बदलती है । 40 गांि पार करने के
बाद िमत या मजहब नहीं बदलता है, बोली नहीं बदलती है । इस सूरत में हहंदी
जबान को बडा बनाने में हमारी भूममका बडी होनी चाहहए । लेककन हम ऐसा
करते नहीं हैं। अगर हम दूसरे प्रांतों से साहहत्य को लाएं उसे पकाएं और इत्र के
ऱूप में बनाने के बाद उसको प्रथतुत करें तो उसका मजा ही क ु छ और होगा ।
लेककन हम ऐसा करते नहीं हैं । क्योंकक अगर हम हहंदी में मलखते हैं तो हमें
यह गुऱूर है कक हम सदी के सबसे बडे विद्िान है । अगर हम उदूत में मलखते हैं
तो हमें महसूस होता है कक गामलब के बाद हम ही सबसे बडे उदूत जबान है ।
प्रश्नः- हहंदी भाषा के विकास के मलए दूसरी भाषाओं के साि ममलकर काम
करने में ककस प्रकार का कायत ककया जा सकता है ?
उत्तरः- यह मान लेना चाहहए कक हहंदी के अलािा भी अन्य भाषाएं हमारी भाषा
है । जैसे खाने के मेज पर कई चीजें सजी होने के बाद उसका तनखार बढ जाता
है उसी प्रकार हहंदी के साि अन्य भाषाओं के सजे होने से हहंदी भाषा का भी
सम्मान बढता है । आजकल पढने का चलन बहत कम हो गया है । इसमलए
ु
हमें चाहहए कक अब बुके की जगह बुक देने का प्रचलन शुऱू करना चाहहए और
हमने लखनऊ में यह शुऱू भी ककया है ।
प्रश्नः- प्रकाशक तो कहते हैं कक अब पुथतक को पढने िालों की बहत कमी हो
ु
गयी है .

