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पहले तो इसका संसार के िल भारतीयों के भीतर िा लेककन समय
के प्रिाह ने इसकी सीमाओं को चरर्बधॎध ऱूप में पररितततत कर विथतृत कर
हदया स्जसके प्रांरमभक चरर् से जाजत धग्रयसतन का नाम आता है। स्जन्होंने
परािीन भारत में विदेशी प्रशासक के पद पर कायतरत होते हए भी सितप्रिम
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सबसे बडा भारतीय भाषाओं का सिेक्षर् ककया, जो तेरह खंडों में मलवपबधॎध है
र्ोटत विमलयम कालेज में हहन्दुथतानी विभाग के अध्यक्ष डॉ.जान धगलिाइथट ने
सितप्रिम हहन्दी की पाठ्य पुथतक मलखी। ‘‘फ्र ें च विद्िान गासात द तासी’’ ने
सितप्रिम हहन्दी भाषा के साहहस्त्यक इततहास को ‘‘इथतिार द ला मलतूरेत्यूर
ऐन्दुई ऐ ऐन्दुथतानी’’ शीषतक से मलखा। यहााँ तक कक हहन्दी की सबसे पहले
डी.मलट् चालीस के दशक में यूतनिमसतटी ऑर् लंदन में जे.ई.कारपेंटर ने
तुलसीदास का िमत दशतन विषय पर की। पादरी सैमुअल कै लाग ने हहन्दी पर
बहत बडा व्याकरर् मलखा।
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तत्पश्चात् समूचे विश्ि के देशों में भारतीय व्यापार नौकरी अन्य
उद्योग िन्िों आहद के कारर् थिायी ऱूप से बस गए। इन प्रिासी भारतीयों ने
हहन्दी के संसार की सीमाएाँ विथतृत करते हए इसे अन्तरातष्रीय मुकाम हदलाया।
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इतनी ऊचाईयों को छ ू ने िाली हहन्दी ककसी राजसी छत्रछाया में भारत व्यापी
नहीं बस्कक राष्रिादी आन्दोलनों सांथक ृ ततक एिं िाममतक पररस्थिततयों ने इसे
सितप्रिम भारतीय मानस के हृदय की क ुं जी बनाया और प्रिासी भारतीयों ने
विदेशी िरती पर अपने लेखन ि सतत् प्रयासों से इसे विश्िव्यापी बनाया
स्जसमें प्रमुख ऱूप से मारीशस में अमभमन्यु अनंत, रामदेि िुरन्दर, कर्जी में
गुरुदयाल शंकर, जोधगंदर मसंह कं िल, प्रो.सुब्रमर्ी खाडी देश में क ृ ष्र्त्रबहारी,
त्रब्रटेन में ऊषा राजे सक्सेना, हदव्या मािुर, कै नेडा में सुमन क ु मार घई, शैलजा
सक्सेना इत्याहद। इसमें कोई दो राय नहीं है कक यह अपने आप में एक सुखद
अनुभूतत है कक आज हहन्दी पूरे विश्ि में अपने अस्थतत्ि को आकार दे रही है।
पररर्ामतः विश्ि के छोटे बडे देशों को लगने लगा है कक भारत के
साि संिाद थिावपत करने के मलए व्यापार, आधितक, सांथक ृ ततक संबंि थिावपत
करने के मलए हहन्दी से पररधचत होना भी आिश्यक है। भारतीय मंडडयों और
बाजारों को हहन्दी के त्रबना जीता नहीं जा सकता। इस मलए कई देशों में हहन्दी
का अध्ययन अध्यापन विश्िविद्यालयों तिा मशक्षर् संथिानों में विदेशी भाषा

